यूपी के 150 से ज़्यादा ग्रामीण हाथियों की रक्षा के लिए रात में गश्त करते हैं
कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले में, नेपाल की सीमा पर स्थित है। यह तराई आर्क लैंडस्केप का हिस्सा है, साल के जंगलों, आर्द्रभूमि और घास के मैदानों का वह इलाका जो उत्तर भारत से दक्षिणी नेपाल तक फैला है, और यह दुधवा के रास्ते नेपाल के बर्दिया नेशनल पार्क से जुड़ता है। इस इलाके में 50 से 150 के बीच जंगली हाथी घूमते हैं, जिनमें से कई नेपाल से आते हैं।
यहां गन्ना और दूसरी फ़सलें जंगल के किनारे तक उगाई जाती हैं, कभी-कभी पेड़ों से बस कुछ मीटर दूर। इसका मतलब है कि एक जंगल से दूसरे जंगल जाते हाथी अक्सर सीधे उन खेतों से गुज़रते हैं जहां लोग रहते और काम करते हैं। यह दोनों तरफ़ टकराव का कारण बनता है: एक रात में किसान की पूरी फ़सल बर्बाद हो सकती है, और डरे हुए गांव वाले जब हाथियों को भगाने की कोशिश करते हैं तो हाथी घायल हो सकते हैं, घबरा सकते हैं या मारे भी जा सकते हैं।
गजमित्र
2021 से गांव वाले इस समस्या से संगठित तरीके से निपट रहे हैं। नेचर एनवायरनमेंट एंड वाइल्डलाइफ़ सोसाइटी (NEWS) ने "गजमित्र" यानी "हाथियों के दोस्त" पहल शुरू की, और बाद में उत्तर प्रदेश वन विभाग ने इसे और मज़बूत किया। स्वयंसेवक एक साल लंबा प्रशिक्षण लेते हैं, जिसमें हाथियों का व्यवहार, टकराव कम करने के तरीके, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और हाथियों के झुंड के पास आने पर सुरक्षित प्रतिक्रिया देना सिखाया जाता है।
आज 150 से ज़्यादा प्रशिक्षित गजमित्र, कुछ आंकड़ों के मुताबिक करीब 160, रामपुरवा, मटेही, अंबा, बिशुनापुर, भवानीपुर और बर्दिया जैसे गांवों में काम करते हैं। इनमें से लगभग सभी किसान हैं, और रात की इस ड्यूटी के लिए किसी को वेतन नहीं मिलता।
गश्त की एक रात
काम खेती का काम ख़त्म होने के बाद शुरू होता है। स्वयंसेवक सुरेश कुमार बताते हैं कि अपना काम निपटाकर और खाना खाकर ही वे हाथी ड्यूटी की तैयारी करते हैं। रात करीब 10:30 बजे स्वयंसेवक इकट्ठा होते हैं, और 11 बजे तक पांच-पांच लोगों की टीमें सीमा से लगे गांवों में फैल जाती हैं। हर टीम के दो सदस्य उन रास्तों पर बने मचानों पर चढ़ते हैं जहां से हाथी अक्सर गुज़रते हैं, और बाकी उन खेतों की जांच करते हैं जहां पिछली शाम ताज़े पैरों के निशान दिखे थे।
उनके पास रिफ़्लेक्टिव जैकेट, सीटियां, टॉर्च, हाथ वाले सायरन और मेगाफ़ोन होते हैं। जब कोई टीम हाथी देखती है, तो सभी टीमों को सूचना दी जाती है और वन विभाग भी साथ आता है। मकसद हाथियों से लड़ना नहीं, बल्कि लोगों को सुरक्षित रखना और हाथियों को जंगल में लौटने की जगह देना है। स्वयंसेवकों का कहना है कि यहां किसी हाथी को बेहोश करने या पकड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ी। सुरेश के मुताबिक यह काम ज़्यादातर निगरानी, तालमेल और धैर्य का है।
अनुभव ने उन्हें हाथियों को समझना सिखा दिया है। किसी मादा मुखिया के नेतृत्व वाले पारिवारिक झुंड को रास्ता दिखाना आमतौर पर आसान होता है; अकेले नर हाथी का व्यवहार कम अनुमानित होता है। महिला स्वयंसेवक, जिनकी संख्या अब भी कम है और पहले साल सिर्फ़ चार शामिल हुई थीं, गांवों को तैयार रखने पर ध्यान देती हैं: वे घर-घर जाकर सुनिश्चित करती हैं कि हाथियों के पास होने पर परिवार घरों के अंदर रहें और भीड़ न जुटे।
क्या यह काम कर रहा है?
NEWS के अनुसार, पिछले एक साल में इस पहल से फ़सलों का नुकसान लगभग 70% कम हुआ है। बर्बाद फ़सल के लिए मुआवज़े की योजनाएं हैं, लेकिन स्वयंसेवक अशोक कुमार कहते हैं कि पैसा बर्बाद खेत की भरपाई तो कर सकता है, पर हाथियों से भरे जंगल के पास रहने का डर और अनिश्चितता दूर नहीं कर सकता। नुकसान होने से पहले उसे रोकने वाली गश्त यह कर सकती है।
चुनौती ख़त्म नहीं हो रही। पहले हाथी ज़्यादातर किसी ख़ास मौसम में दिखते थे, अब साल भर दिखते हैं, जिसे स्वयंसेवक जंगलों के टुकड़ों में बंटने और खेती के जंगल के किनारे तक पहुंचने से जोड़ते हैं। इससे ऐसी सामुदायिक व्यवस्थाएं और भी ज़रूरी हो जाती हैं। यह बिना वेतन, स्थानीय लोगों द्वारा चलाया जाने वाला समाधान है, जिसे उन लोगों ने बनाया है जो हाथियों के पड़ोसी हैं और जिन्होंने तय किया कि टकराव का इंतज़ार करके बाद में नुकसान समेटना काफ़ी नहीं है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गजमित्र कौन हैं?
गजमित्र यानी "हाथियों के दोस्त" उत्तर प्रदेश के कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य के आसपास के प्रशिक्षित ग्रामीण स्वयंसेवक हैं, जो इंसानों और जंगली हाथियों के बीच टकराव रोकने के लिए रात में गश्त करते हैं।
गजमित्र पहल किसने शुरू की?
नेचर एनवायरनमेंट एंड वाइल्डलाइफ़ सोसाइटी (NEWS) ने 2021 में इसे शुरू किया, और बाद में उत्तर प्रदेश वन विभाग ने इसे मज़बूत किया।
क्या गजमित्र कार्यक्रम से फ़सलों का नुकसान कम हुआ है?
NEWS के अनुसार, पिछले एक साल में गश्त से फ़सलों का नुकसान लगभग 70% कम हुआ है।
Source: The Better India